उत्तराखंड

ग्रहों के समान शक्तिशाली हैं अष्टनाग: पूजा से दूर होंगे राहु-केतु और कालसर्प दोष

पंडित सुभाष चंद्र नौटियाल, पूर्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, लोनिवि:  सनातन धर्म में नाग पूजा का महत्व न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक है, बल्कि इसका सीधा संबंध ज्योतिष और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जहाँ भी नाग देवता का वास होता है, वहाँ धन की देवी महालक्ष्मी अवश्य निवास करती हैं। शास्त्रों के अनुसार, विधि-विधान से अष्टनागों की पूजा करने से मनुष्य को सर्प एवं विष के भय से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है। गृह निर्माण, पितृ दोष निवारण और कुल की उन्नति के लिए भी इस पूजा का विशेष विधान है। हमारे शरीर के भीतर भी नाग का वास माना गया है, जहां वे मूलाधार चक्र के आकार में स्थित होते हैं और उनका फन सहस्रार चक्र कहलाता है।
लिंगपुराण के अनुसार कैसे हुई नागों की उत्पत्ति?
पौराणिक ग्रंथों के कल्पभेद के अनुसार, नागों की उत्पत्ति के विषय में अनेक दिव्य कथाएं प्रचलित हैं। ‘लिंगपुराण’ के मत के अनुसार, सृष्टि सृजन के उद्देश्य से जब सृष्टि रचयिता भगवान ब्रह्मा घोर तपस्या कर रहे थे, तब अत्यंत हताश होने के कारण उनके क्रोध से कुछ अश्रु पृथ्वी पर गिरे। इन अश्रुओं से तत्काल ‘तक्षण सर्प’ उत्पन्न हुए। इन सर्पों के साथ भविष्य में कोई अन्याय न हो, इसी कल्याणकारी विचार से भगवान सूर्य नारायण ने इन्हें एक विशेष अधिकार दिया, जिससे इनकी पूजा का विधान संपूर्ण जगत में प्रसिद्ध हुआ।
नवग्रहों और अष्टनागों का दिव्य अंतर्संबंध
सृष्टि के संचालन में अष्टनाग ठीक उसी प्रकार भूमिका निभाते हैं जैसे सौरमंडल के मुख्य ग्रह। ब्रह्मा जी द्वारा रचित इन अष्टनागों को नवग्रहों के समान ही शक्तिशाली माना गया है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार अष्टनाग और ग्रहों का संबंध इस प्रकार है:

| नाग देवता | संबंधित नवग्रह |
अनंत नाग -सूर्य ग्रह के प्रतीक हैं |
वासुकी नाग|- चंद्रमा के प्रतीक हैं |
तक्षक नाग- मंगल ग्रह के प्रतीक हैं |
कर्कोटक नाग-बुध ग्रह के प्रतीक हैं |
पद्म नाग-बृहस्पति (गुरु) ग्रह के प्रतीक हैं |
महापद्म नाग -शुक्र ग्रह के प्रतीक हैं |
कुलिक और शंखपाल नाग- शनि ग्रह के स्वरूप माने गए हैं |

इसके अतिरिक्त, भगवान विष्णु स्वयं शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं, तो देवाधिदेव महादेव शिव इन्हें अपने कंठ का आभूषण बनाते हैं। भगवान रुद्र, विघ्नहर्ता गणेश और काल भैरव नागों को यज्ञोपवीत (जनेऊ) के रूप में धारण करते हैं। इन अष्टनागों में से परम प्रतापी शेषनाग स्वयं संपूर्ण पृथ्वी को अपने फन पर धारण किए हुए हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि ये सभी अष्टनाग ‘अष्ट लक्ष्मी’ के परम अनुचर (सेवक) हैं, इसलिए इनकी पूजा से आर्थिक तंगी और वंश वृद्धि की रुकावटें दूर होती हैं।

महात्मनां श्रीनवनागनामस्तोत्रम् ॥

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम् । शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा ॥ १ ॥

एतानि नवनामानि नागानां च महात्मनाम् ।सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः ॥ २ ॥

 तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ३ ॥

 श्रीनवनागनामस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का महत्व: ज्योतिष आचार्यों के अनुसार, शत्रु शमन, कोर्ट-कचहरी के मामलों में सफलता और संतान संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए नागों के इन 9 नामों वाले स्तोत्र का प्रतिदिन तीन बार पाठ करने से यथोचित लाभ मिलता है। इसके साथ ही नाग गायत्री का जाप करने से भी अभीष्ट कार्य सिद्ध होते हैं।

राहु-केतु दोष और कालसर्प दोष से मुक्ति
वैदिक ज्योतिष संहिता के अनुसार, कुंडली के दो छाया ग्रहों में से ‘राहु’ को काल और ‘केतु’ को सर्प का रूप माना गया है। अतः नागों की पूजा करने से जातक की जन्म कुंडली में स्थित राहु-केतु जन्य सभी अशुभ दोषों का शमन होता है। विशेष रूप से यह पूजा जातक को भयंकर ‘कालसर्प दोष’ के कुप्रभावों और विषधारी जीवों के दंश के भय से मुक्ति दिलाती है।

आधुनिक निर्माण और नींव की परंपराएं
आज के समय में भी नए घर का निर्माण करते समय परिवार में वंश वृद्धि, सुख-शांति और मां लक्ष्मी की अखंड कृपा बनाए रखने के लिए घर की नींव (फाउंडेशन) में चांदी से निर्मित ‘नाग-नागिनी का जोड़ा’ स्थापित करने की सनातन परंपरा जीवित है। श्रद्धालु मिट्टी या धातु की मूर्ति बनाकर अथवा शिवलिंग पर स्थापित तांबे/चांदी के नाग की पूजा कर समान पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं।

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